*ज्येष्ठ कवयित्री प्रज्ञा घोड़के की इकसठवीं सालगिरा के अवसर पर लिखी हुई बेहतरीन रचना*
*इकसठी पूरी हो गयी…!!*
इकसठी पूरी हो गयी,
जीवन का यह सुंदर पडाव आया।
समय ने अनुभव के स्वर्णिम अक्षर,
मन के आँगन में लिखवाया।।
बालों में चाँदी झलकी तो क्याँ,
मन अब भी उजियारा हैं।
बीते वर्षों की हर स्मृती ने,
जीवन को और निखारा हैं।।
कुछ सपने साकार हुए,
कुछ अब भी मुस्कातें हैं।
हर नयी सुबह के संग फिर,
जीने के अर्थ सिखाते हैं।।
हँसी, संघर्ष, प्रेम, तपस्या
सब का अनुपम संगम मिला।
सुख-दुख की इस जीवन सरिता में,
अनुभव का अमृत फल मिला।।
हर ठोकर ने राह दिखाई,
हर आँसू ने बल देना सिखाया।
ईश्वर की अनुपम कृपा से,
हर पल जी भरकर जी लिया।।
अब न कोईं बडी अभिलाषा,
न मन में कोईं गिला रहें।
बस अपने सदा साथ रहें,
चेहरे पर मधुर मुस्कान रहें।।
प्रभु! इतनी सी विनती मेरी,
स्नेह का दीप सदा जलता रहें।
स्वस्थ तन, प्रसन्न मन के संग,
जीवन यूँ ही मेहकता रहें।।
इकसठी के इस शुभ अवसर पर,
हृदय कृतज्ञता से भर आया हैं।
जो कुछ पाया प्रभु-प्रसाद समझ,
जीवन को शत-शत नमन किया हैं।।
प्रज्ञा घोडके,चिंचवड,पुणे©®
