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जय श्रीहरी

*जागतिक साहित्य कला व्यक्तित्व विकास मंचच्या सन्मा सदस्या ज्येष्ठ लेखिका कवयित्री विजया केळकर लिखित अप्रतिम काव्यरचना*

 

*जय श्रीहरी*

 

मोरपीस खोवून शिरी

 

वेणू वाजवील श्रीहरी

 

गुंग करी स्वर लहरी

 

कदंबतरु ताल धरी

 

 

 

भुलवी ऐसे नरनारी

 

भरी भरी पिचकारी

 

उडवी रंग गिरिधारी

 

खेळवी हा रास बिहारी

 

 

 

रंगी न्हाली दुनिया न्यारी

 

अजीबसा प्रेमरंगारी

 

जन सारे नाम पुकारी

 

जय जय कृष्ण मुरारी

 

 

 

जो जो आला तुझ्या दारी

 

भुलवी भक्तीरंग भारी

 

भाव ओळखी हा रंगारी

 

षड्रिपुपासून निवारी

 

 

 

गोरी राधा सावळा हरी

 

एकरुप मन मंदिरी

 

राधेकृष्ण राधेकृष्ण

 

जपू जोवरी प्राण शरिरी

 

विजया केळकर ________

नागपूर

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