जागतिक साहित्य कला व्यक्तित्व विकास मंच की सदस्या लेखिका कवयित्री अख्तर पठाण की बेमीसाल काव्यरचना
हम ना कभी बुरे थे ना बुरे हैं औंर ना रहेंगे.,
लेकिन वक्त का तक़ाज़ा अब यही कहता हैं के हम बुरे बन जाएंगे…।
हमें हमारे हाल पर छोड़ दो जनाब.,
ग़म-ए-हाल पहले भी सहते थे अब भी सहते हैं औंर आगे भी सह लेंगे…।
वक्त ने ढ़ाए हैं कुछ ऐसे सितम.,
बग़ैर मरहम साथ थे साथ हैं औंर साथ रहेंगे..।
ज़िन्दगी जीने का कुछ इस तरह तय किया हैं.,
पहले भी तन्हा थे तन्हा हैं औंर तन्हा ही रहेंगे..।
बहारें बनकर तो आती हैं सुबह बहोत.,
मगर मुरझाई हुई शामे ना खिलीं थी ना खिलीं हैं औंर ना कभी खिलेंगी…।
ज़िन्दगी यु रुसवा हुई हमसे गर तो हम क्या करें.,
तेरे बेरुख़ी में जीते थे जीते हैं औंर आगे भी जी लेंगे…।
*अख़्तर* अब जो बित गई सो बित गई.,
जैसे ग़म में थे ग़म में हैं औंर आगे भी ग़म में रह लेंगे…।
✍🏻 *अख़्तर पठाण*
*(नासिक रोड)*
*मो.:- 9420095259*