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मानसहोळी

*जागतिक साहित्य कला व्यक्तित्व विकास मंचच्या सन्मा सदस्या ज्येष्ठ लेखिका कवयित्री सौ. मंजिरी अनसिंगकर लिखित अप्रतिम काव्यरचना*

 

*॥मानसहोळी॥* 

संत जनाबाई यांची!

 

कराया साजरा। होलिकेचा सण।

मनाचे स्थान। निवडीले॥

 

ऐसे ते स्थान। साधने सरावले।

भक्तीने शिंपिले। केले सिद्ध॥

 

त्या स्थानी खळगा। समर्पणाचा केला।

त्यात उभा ठेला । अहंकार एरंड॥

 

रचलीया तेथे। लाकडे वासनांची।

इंद्रीयगोवऱ्याची। रास भली॥

 

गुरुकृपा तैल। रामनाम घृत।

अर्पिले तयात। ऐसे केले॥

 

रेखिली भोवती। सत्त्कर्म रांगोळी।

भावरंगाचे मेळी। शोभिवंत॥

 

वैराग्य अग्नीसी। तयाते स्थापिले।

यज्ञरूप आले। झाली कृपा॥

 

दिधली तयाते। विषयांची आहुती |

आणिक पुर्णाहूती। षड्रिपु श्रीफळ॥

 

झाले सर्व हुत। वैराग्य अग्नीत।

जाणावया तेथ। नुरले काही॥

 

वाळ्या म्हणे जनी।

व्हावी ऐसी होळी।

जेणे मुक्तीची दिवाळी।

अखंडित॥

 

सौ. मंजिरी अनसिंगकर,

नागपूर

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